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National Education Policy

भारतीय शिक्षा की विकास विकास यात्रा:-

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy) 1968

  • स्वतंत्र भारत में शिक्षा पर यह पहली नीति कोठारी आयोग (1964-1966) की सिफारिशों पर आधारित थी।
  • शिक्षा को राष्ट्रीय महत्त्व का विषय घोषित किया गया।
  • 14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों के लिये अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य और शिक्षकों का बेहतर प्रशिक्षण और योग्यता पर फोकस।
  • नीति ने प्राचीन संस्कृत भाषा के शिक्षण को भी प्रोत्साहित किया, जिसे भारत की संस्कृति और विरासत का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता था।
  • शिक्षा पर केन्द्रीय बजट का 6 प्रतिशत व्यय करने का लक्ष्य रखा।
  • माध्यमिक स्तर पर ‘त्रिभाषा सूत्र’ लागू करने का आह्वान किया गया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy) 1986

  • इस नीति का उद्देश्य असमानताओं को दूर करने विशेष रूप से भारतीय महिलाओं, अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जाति समुदायों के लिये शैक्षिक अवसर की बराबरी करने पर विशेष ज़ोर देना था।
  • इस नीति ने प्राथमिक स्कूलों को बेहतर बनाने के लिये “ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड” लॉन्च किया।
  • इस नीति ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के साथ ‘ओपन यूनिवर्सिटी’ प्रणाली का विस्तार किया।
  • ग्रामीण भारत में जमीनी स्तर पर आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देने के लिए महात्मा गांधी के दर्शन पर आधारित “ग्रामीण विश्वविद्यालय” मॉडल के निर्माण के लिये नीति का आह्वान किया गया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy) में संशोधन 1992

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में संशोधन का उद्देश्य देश में व्यावसायिक और तकनीकी कार्यक्रमों में प्रवेश के लिये अखिल भारतीय आधार पर एक आम प्रवेश परीक्षा आयोजित करना था।
  • इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर कार्यक्रमों में प्रवेश के लिये सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त प्रवेश परीक्षा (Joint Entrance Examination-JEE) और अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा (All India Engineering Entrance Examination-AIEEE) तथा राज्य स्तर के संस्थानों के लिये राज्य स्तरीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा (SLEEE) निर्धारित की।
  • इसने प्रवेश परीक्षाओं की बहुलता के कारण छात्रों और उनके अभिभावकों पर शारीरिक, मानसिक और वित्तीय बोझ को कम करने की समस्याओं को हल किया।

भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति : नई शिक्षा नीति (NEP) जिसे 29 जुलाई 2020 में प्राइम मिनिस्टर नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी मिलने के बाद लागू किया गया है। अंतिम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में बनाई गई थी जिसमें वर्ष 1992 में संशोधन किया गया था । वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 अंतरिक्ष वैज्ञानिक पद्म विभूषण डॉ के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट पर आधारित है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी 2020), भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा शुरू किया गया, भारत की नई शिक्षा प्रणाली के दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। यह नीति ग्रामीण और शहरी दोनों में प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च और व्यावसायिक प्रशिक्षण तक के लिए एक व्यापक रूपरेखा है। यह नई नीति पिछली राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 का स्थान लेती है जिसका लक्ष्य 2030 तक वर्तमान शिक्षा प्रणाली में सुधार कर भारत की शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता को बढ़ावा देना है।

नई शिक्षा नीति भारतीय शिक्षा प्रणाली को सुधारने और मूल्यांकन करने का एक महत्वपूर्ण कदम है। इस नीति का मुख्य उद्देश्य भारतीय शिक्षा प्रणाली को अद्यतन करना, छात्रों के विकास को समर्थन करना, उन्हें नौकरियों के लिए तैयार करना, और अधिक उत्कृष्ट और सामाजिक शिक्षा प्रदान करना है। इस नीति में शिक्षा के कई क्षेत्रों में सुधार के प्रस्ताव शामिल हैं, जैसे कि सिलेबस में परिवर्तन, शिक्षकों की प्रशिक्षण और अनुशासन, नौकरी तैयारी के कौशलों का समर्थन, और गुरुकुल प्रणाली का पुनर्विचार। इससे शिक्षा प्रणाली में सुधार होगा और छात्रों को एक अधिक प्रेरणादायक, उत्कृष्ट, और समर्पित शिक्षा प्राप्त होगा।

नई शिक्षा नीति भारतीय शिक्षा प्रणाली का मुख्य उद्देश्य इंडिया में एजुकेशन को ग्लोबल लेवल पर लाना है जिससे इंडिया महाशक्ति बन सके। नई शिक्षा नीति के तहत स्कूल से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा नीति में बदलाव किया गया है। इसके तहत नाॅलेज के साथ ही उनकी हेल्थ और स्किल डेवलपमेंट शामिल है, नई शिक्षा नीति भारतीय शिक्षा प्रणाली नई शिक्षा नीति के अंतर्गत केंद्र व राज्य सरकार के सहयोग से शिक्षा क्षेत्र पर जीडीपी के 6% हिस्से के सार्वजनिक व्यय का लक्ष्य रखा गया है, नई शिक्षा नीति की घोषणा के साथ ही मानव संसाधन प्रबंधन मंत्रालय का नाम परिवर्तित कर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है।

स्कूली शिक्षा संबंधी प्रावधान:

नई शिक्षा नीति के तहत स्कूल में 5वीं तक शिक्षा मातृभाषा या फिर क्षेत्रीय भाषा में दी जाएगी, इसमें 3 साल की फ्री स्कूल शिक्षा होगी, छठी कक्षा से बिजनेस इंटर्नशिप स्टार्ट कर दी जाएगी, न्यू एजुकेशन पाॅलिसी आने के बाद कोई भी सब्जेक्ट चुन सकते हैं और स्टूडेंट्स फिजिक्स के साथ अकाउंट या फिर आर्ट्स का भी सब्जेक्ट पढ़ सकते हैं।

स्टूडेंट्स को छठी कक्षा से कोडिंग सिखाना भी शामिल है, सभी स्कूल डिजिटल इक्विटी किए जाएंगे, वर्चुअल लैब डेवलप की जाएंगी, ग्रेजुएशन में 3 या 4 साल लगता है, जिसमें एग्जिट ऑप्शन होंगे। यदि स्टूडेंट्स ने एक साल ग्रेजुएशन की पढ़ाई की है तो उसे सर्टिफिकेट मिलेगा और 2 साल बाद एडवांस डिप्लोमा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रमुख प्रावधान:

  • स्कूली शिक्षा संबंधी प्रावधान।
  • उच्च शिक्षा से संबंधित प्रावधान।
  • डिजिटल शिक्षा से संबंधित प्रावधान।
  • पाठ्यक्रम और मूल्यांकन सुधार प्रावधान।
  • शिक्षण व्यवस्था से संबंधित सुधार प्रावधान।

1. स्कूली शिक्षा संबंधी प्रावधान:- नई शिक्षा नीति में स्कूली शिक्षा संबंधी प्रावधान के अंतर्गत 5+3+3+4 पैटर्न फॉलो किया जाएगा, इसमें 12 साल की स्कूल शिक्षा होगी और 3 साल की फ्री स्कूल शिक्षा होगी, नई शिक्षा नीति में 5 + 3 + 3 + 4 डिज़ाइन वाले शैक्षणिक संरचना का प्रस्ताव किया गया है जो 3 से 18 वर्ष की आयु वाले बच्चों को शामिल करता है।

  • 5 वर्ष की फाउंडेशनल स्टेज :  नई शिक्षा नीति के तहत स्कूल में 5वीं तक शिक्षा मातृभाषा या फिर क्षेत्रीय भाषा में दी जाएगी,
  • 1, 2, 3 वर्ष का प्रीपेट्रेरी स्टेज : 3 साल का प्री-प्राइमरी स्कूल और ग्रेड दी जाएगी,
  • 3 वर्ष का मध्य, उच्च प्राथमिक स्टेज: 3 वर्ष का मध्य (या उच्च प्राथमिक) चरण – ग्रेड 6, 7, 8,
  • 4 वर्ष का उच्च (या माध्यमिक) चरण:  ग्रेड 9, 10, 11, 12

2. उच्च शिक्षा से संबंधित प्रावधान:- वर्तमान में उच्च शिक्षा निकायों का विनियमन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) जैसे निकायों के माध्यम से किया जाता है, नई शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘सकल नामांकन अनुपात’ (Gross Enrolment Ratio) को 26.3% (वर्ष 2018) से बढ़ाकर 50% तक करने का लक्ष्य रखा गया है।

भारतीय उच्च शिक्षा आयोग:-

नई शिक्षा नीति (NEP) में देश भर के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिये एक एकल नियामक अर्थात् भारतीय उच्च शिक्षा परिषद, (Higher Education Commission of India-HECI) की परिकल्पना की गई है जिसमें विभिन्न भूमिकाओं को पूरा करने हेतु कई कार्यक्षेत्र होंगे। भारतीय उच्च शिक्षा आयोग चिकित्सा एवं कानूनी शिक्षा को छोड़कर पूरे उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिये एक एकल निकाय (Single Umbrella Body) के रूप में कार्य करेगा।

देश में उच्च शिक्षण संस्थानों में 3.5 करोड़ नई सीटों को जोड़ा जाएगा।देश में आईआईटी (IIT) और आईआईएम (IIM) के समकक्ष वैश्विक मानकों के ‘बहुविषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय’ (Multidisciplinary Education and Reserach Universities – MERU) की स्थापना की जाएगी।

HECI के कार्यों के प्रभावी निष्पादन हेतु चार निकाय-

  • राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामकीय परिषद (National Higher Education Regulatroy Council-NHERC) : यह शिक्षक शिक्षा सहित उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिये एक नियामक का कार्य करेगा।
  • सामान्य शिक्षा परिषद (General Education Council – GEC) : यह उच्च शिक्षा कार्यक्रमों के लिये अपेक्षित सीखने के परिणामों का ढाँचा तैयार करेगा अर्थात् उनके मानक निर्धारण का कार्य करेगा।
  • राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (National Accreditation Council – NAC) : यह संस्थानों के प्रत्यायन का कार्य करेगा जो मुख्य रूप से बुनियादी मानदंडों, सार्वजनिक स्व-प्रकटीकरण, सुशासन और परिणामों पर आधारित होगा।
  • उच्चतर शिक्षा अनुदान परिषद (Higher Education Grants Council – HGFC) : यह निकाय कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों के लिये वित्तपोषण का कार्य करेगा।

नई शिक्षा नीति में प्रावधान के अंतर्गत उच्च शिक्षा के तहत स्नातक पाठ्यक्रम में मल्टीपल एंट्री एंड एक्ज़िट व्यवस्था को अपनाया गया है, इसके तहत 3 या 4 वर्ष के स्नातक कार्यक्रम में छात्र कई स्तरों पर पाठ्यक्रम को छोड़ सकेंगे, और उन्हें उसी के अनुरूप डिग्री या प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाएगा, (1 वर्ष के बाद प्रमाण-पत्र, 2 वर्षों के बाद एडवांस डिप्लोमा, 3 वर्षों के बाद स्नातक की डिग्री तथा 4 वर्षों के बाद शोध के साथ स्नातक डिग्री प्रदान कि जाएगी।

नई शिक्षा नीति में प्रावधान के अंतर्गत उच्च शिक्षा के तहत विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों से प्राप्त अंकों या क्रेडिट को डिजिटल रूप से सुरक्षित रखने के लिये एक ‘एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ (Academic Bank of Credit) दिया जाएगा, ताकि अलग-अलग संस्थानों में छात्रों के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें डिग्री प्रदान की जा सके, नई शिक्षा नीति के तहत एम.फिल. कार्यक्रम को समाप्त कर दिया गया है।

डिजिटल शिक्षा से संबंधित प्रावधान:- एक स्वायत्त निकाय के रूप में ‘‘राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच’’ (National Educational Technol Forums) का गठन किया जाएगा जिसके द्वारा शिक्षण, मूल्यांकन योजना एवं प्रशासन में अभिवृद्धि हेतु विचारों का आदान-प्रदान किया जा सकेगा, डिजिटल शिक्षा संसाधनों को विकसित करने के लिये अलग प्रौद्योगिकी इकाई का विकास किया जाएगा जो डिजिटल बुनियादी ढाँचे, सामग्री और क्षमता निर्माण हेतु समन्वयन का कार्य करेगी।

नई शिक्षा नीति के अनुसार, डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई प्रावधान हैं। यहां उनमें से कुछ मुख्य विशेषताएँ हैं:

  • डिजिटल शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन: नीति में डिजिटल शिक्षा की गुणवत्ता को मापने के लिए मूल्यांकन प्रक्रियाओं की प्रावधानिकता है।
  • डिजिटल शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन: नीति में डिजिटल शिक्षा की गुणवत्ता को मापने के लिए मूल्यांकन प्रक्रियाओं की प्रावधानिकता है।
  • छात्रों के डिजिटल योग्यता का विकास: नीति में डिजिटल योग्यता के विकास को महत्वपूर्ण माना गया है, ताकि छात्र आधुनिक शिक्षा प्रौद्योगिकियों का सही तरीके से उपयोग कर सकें।
  •  विशेषज्ञ संस्थानों के साथ साझा काम: नई शिक्षा नीति के अनुसार, विशेषज्ञ संस्थानों के साथ साझा काम करके डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने की कोशिश की जाएगी।
  • छात्रों के डिजिटल योग्यता का विकास: नीति में डिजिटल योग्यता के विकास को महत्वपूर्ण माना गया है, ताकि छात्र आधुनिक शिक्षा प्रौद्योगिकियों का सही तरीके से उपयोग कर सकें।
  • डिजिटल शिक्षा संबंधी निर्देशिकाएं: नीति में डिजिटल शिक्षा को संबंधित निर्देशिकाओं के तहत संगठित करने की योजना है, जो इस क्षेत्र में सामान्य मानकों और प्रथाओं को स्थापित करेगी।
  • डिजिटल सामग्री और पुस्तकालय: नीति में डिजिटल सामग्री के विकास और प्रसार के लिए प्रोत्साहन के प्रावधान हैं। साथ ही, डिजिटल पुस्तकालयों की स्थापना के लिए भी उत्साहजनक कदम उठाए गए हैं।
  • ऑनलाइन शिक्षा प्लेटफ़ॉर्म: एक राष्ट्रीय ऑनलाइन शिक्षा प्लेटफ़ॉर्म की स्थापना के लिए योजनाएं बनाई गई हैं, जिससे विद्यार्थी ऑनलाइन कक्षाओं और संबंधित संसाधनों तक पहुंच सकें।
  • डिजिटल शिक्षक प्रशिक्षण: नीति में डिजिटल शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों की प्रावधानिकता है, जो उन्हें नवीनतम शैक्षणिक प्रौद्योगिकियों और उनके उपयोग की प्रभावी तरीके से सीखाएगा।
  • समुच्चित डिजिटल सामग्री: नीति में विभिन्न विषयों के लिए समुच्चित और उपयुक्त डिजिटल सामग्री के विकास और प्रसार के लिए निर्देशिकाएं शामिल हैं।
  • टेक्नोलॉजी प्रयोगशाला: शैक्षिक संस्थानों में टेक्नोलॉजी प्रयोगशालाओं की स्थापना के लिए अधिक धन का प्रबंधन किया जाएग।
  • डिजिटल शिक्षा केंद्र: नीति द्वारा डिजिटल शिक्षा केंद्रों की स्थापना की गई है, जो विद्यार्थियों को डिजिटल शिक्षा तक पहुंचाने का काम करेंगे।
  • ऑनलाइन परीक्षण: डिजिटल शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन परीक्षण को बढ़ावा देने के लिए नीति में विशेष प्रावधान हैं। यह छात्रों को उच्च स्तर की सुरक्षा और प्रभावी परीक्षण प्रक्रिया प्रदान करेगा।
  • डिजिटल सक्षमता: नई नीति के अनुसार, डिजिटल सक्षमता को महत्वपूर्ण बनाने के लिए विद्यार्थियों को सक्षम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, ताकि वे आधुनिक शिक्षा प्रौद्योगिकियों का उपयोग समझ सकें।
  • डिजिटल लर्निंग: नई नीति में डिजिटल लर्निंग को प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए उपायों समेत किया गया है।
  • डिजिटल सुरक्षा: डिजिटल शिक्षा को सुरक्षित और निर्भर बनाने के लिए संबंधित नीतियों और दिशानिर्देशों का पालन किया जाएगा।
  • संचार प्रोटोकॉल: डिजिटल शिक्षा के क्षेत्र में संचार प्रोटोकॉल के माध्यम से छात्रों, शिक्षकों, और प्रशासनिक कर्मचारियों के बीच संचार को सुगम बनाने के लिए नीति में प्रावधान किया गया है।

नई शिक्षा नीति के अंतर्गत डिजिटल शिक्षा को स्थापित और सुरक्षित बनाने के लिए अहम उपाय हैं, इन प्रावधानों के माध्यम से, नई शिक्षा नीति डिजिटल शिक्षा को सुगम और प्रभावी बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा रही है।

4. पाठ्यक्रम और मूल्यांकन सुधार प्रावधान:-

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’ (National Council of Educational Research and Training- NCERT) द्वारा ‘स्कूली शिक्षा के लिये राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा’ (National Curricular Framework for School Education) तैयार की जाएगी।

छात्रों की प्रगति के मूल्यांकन के लिये मानक-निर्धारक निकाय के रूप में ‘परख’ (PARAKH) नामक एक नए ‘राष्ट्रीय आकलन केंद्र’ (National Assessment Centre) की स्थापना की जाएगी।

  • इस नीति में प्रस्तावित सुधारों के अनुसार, कला और विज्ञान, व्यावसायिक तथा शैक्षणिक विषयों एवं पाठ्यक्रम व पाठ्येतर गतिविधियों के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं होगा।
  • कक्षा-6 से ही शैक्षिक पाठ्यक्रम में व्यावसायिक शिक्षा को शामिल कर दिया जाएगा और इसमें इंटर्नशिप (Internship) की व्यवस्था भी दी जाएगी।
  • छात्रों के समग्र विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए कक्षा-10 और कक्षा-12 की परीक्षाओं में बदलाव किये जाएंगे। इसमें भविष्य में समेस्टर या बहुविकल्पीय प्रश्न आदि जैसे सुधारों को शामिल किया जा सकता है।
  • छात्रों की प्रगति के मूल्यांकन तथा छात्रों को अपने भविष्य से जुड़े निर्णय लेने में सहायता प्रदान करने के लिये आधारित सॉफ्टवेयर AI का प्रयोग किया जा सकता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पाठ्यक्रम और मूल्यांकन  है। 

  • मौलिक शिक्षा: मौलिक शिक्षा को महत्वपूर्ण बनाया जाना चाहिए, जिसमें नैतिक मूल्यों, समाजिक न्याय के सिद्धांतों और नागरिक जिम्मेदारियों का विकास हो।
  • क्षमता विकास: पाठ्यक्रम को छात्रों के क्षमता विकास को समर्थन करने के लिए डिज़ाइन किया जाना चाहिए, जिससे वे नौकरी, उच्च शिक्षा या व्यवसायिक विकास के लिए तैयार हो सकें।
  • प्रभावी मूल्यांकन: पाठ्यक्रम के प्रभावी मूल्यांकन के लिए नए तथा समर्थनीय तकनीकों का उपयोग किया जाना चाहिए, जिससे छात्रों की प्रगति का सही माप लिया जा सके।
  • ग्लोबल प्रतिस्थापन: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में भारत की स्थिति को मजबूत करने के लिए पाठ्यक्रम को ग्लोबल स्तर पर आधारित किया जाना चाहिए।
  • व्यावसायिक शिक्षा: पाठ्यक्रम में व्यावसायिक शिक्षा को विस्तार से शामिल किया जाना चाहिए, जो छात्रों को आज के बाजार में सफलता प्राप्त करने के लिए तैयार करेगा।
  • सामाजिक समायोजन: सामाजिक समायोजन को समर्थन करने के लिए शिक्षा नीति में सुधार किया जाना चाहिए। इससे विभिन्न वर्गों और समुदायों के छात्रों को बराबरी का मौका मिलेगा।
  • प्रौद्योगिकी का उपयोग: शिक्षा में प्रौद्योगिकी का उपयोग करने के लिए नवीनतम तकनीकी साधनों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच में सुधार हो।
  • विविधता का प्रोत्साहन: विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और क्षेत्रीय ज्ञान को समाहित करने के लिए पाठ्यक्रम में विविधता का प्रोत्साहन किया जाना चाहिए।
  • शिक्षा का सामग्रीकरण: शिक्षा का सामग्रीकरण करने के लिए पाठ्यक्रम में नवीनतम और अनुकूल सामग्री का प्रयोग किया जाना चाहिए, जो छात्रों को वास्तविक जीवन में उपयोगी ज्ञान प्रदान करेगा। पाठ्यक्रम में नवाचारी शिक्षा को शामिल करना चाहिए, जो छात्रों को नए और अनुप्रयोगी सोचने की प्रेरणा देगा।
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष शिक्षा: शिक्षा को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाने के लिए पाठ्यक्रम में स्वतंत्र विचार को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे छात्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता प्राप्त हो।
  • छात्रों की रुचि का महत्व: पाठ्यक्रम को ऐसे विषयों और क्षेत्रों पर फोकस करना चाहिए जो छात्रों की रुचि को बढ़ाएं और उनके प्रति सकारात्मक रूप से लगाव बनाएं।
  • पाठ्यक्रम का समायोजन: नई तकनीकों, उत्पादों और विचारों के आधार पर पाठ्यक्रम को समायोजित करना चाहिए। यह सिद्ध करेगा कि छात्रों को विशिष्ट क्षेत्र में नवीनतम ज्ञान प्राप्त हो।
  • उत्तम संसाधनों का प्रयोग: उत्तम संसाधनों का प्रयोग करके शिक्षा प्रक्रिया को सुधारा जा सकता है। यह शिक्षकों की प्रशिक्षण, शैक्षणिक सामग्री, और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के माध्यम से संभव है।
  • खेल-कूद और क्रिएटिविटी: खेल-कूद और क्रिएटिविटी को बढ़ावा देने के लिए पाठ्यक्रम में विशेष स्थान दिया जाना चाहिए, जो छात्रों की शारीरिक और मानसिक विकास को समर्थन करेगा।
  • स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा: पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिए, जिससे छात्रों का शारीरिक, मानसिक और आधारिक विकास हो सके।
  • समाजिक और आर्थिक समर्थन: गरीबी, जातिवाद, लैंगिक समानता, और समाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा नीति को उन्हें समर्थन करना चाहिए।
  • संवेदनशीलता और सामाजिक न्याय: शिक्षा नीति में संवेदनशीलता और सामाजिक न्याय को मजबूत किया जाना चाहिए। यह सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण और समर्थ समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
  • अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी: शिक्षा नीति में अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि स्थानीय आवश्यकताओं और विचारों को समझा जा सके।

इन सभी सुधारों के माध्यम से, हम शिक्षा के क्षेत्र में एक समृद्ध, समर्थ और समान भारत की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं। यह समृद्धि, सामाजिक न्याय और अधिकारिकता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

इन सभी सुधारों के माध्यम से, हम शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता और समर्थ नागरिकों की तैयारी में सुधार कर सकते हैं, हम शिक्षा के क्षेत्र में स्थिरता, उत्कृष्टता, और सामाजिक न्याय की दिशा में प्रगति कर सकते हैं।

यह समृद्धि और समाज में समानता की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान करेगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति  पाठ्यक्रम और मूल्यांकन में गुणवत्ता और प्रभाव बढ़ाए जा सकते हैं, यह एक    समृद्ध और समान भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा,

4. शिक्षण व्यवस्था से संबंधित सुधार प्रावधान :- राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद वर्ष 2022 तक ‘शिक्षकों के लिये राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक’ का विकास किया जाएगा। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा NCERT के परामर्श के आधार पर ‘अध्यापक शिक्षा हेतु राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा’ का विकास किया जाएगा, वर्ष 2030 तक अध्यापन के लिये न्यूनतम डिग्री योग्यता 4-वर्षीय एकीकृत बी.एड. डिग्री का होना अनिवार्य किया जाएगा, शिक्षकों की नियुक्ति में प्रभावी और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन तथा समय-समय पर लिये गए कार्य-प्रदर्शन आकलन के आधार पर पदोन्नति किया जाएगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षण व्यवस्था से संबंधित सुधार किए जा सकते हैं। इनमें से कुछ मुख्य प्रावधान हैं:

  • शैक्षणिक सामग्री: शैक्षणिक सामग्री को समृद्ध और अद्यतित बनाने के लिए नवीनतम तथा समर्थनीय साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  • शिक्षा मानकों का पालन: शिक्षा मानकों का पालन करने और मानकों की गुणवत्ता को बढ़ावा देने के लिए संबंधित प्राधिकरणों को सक्षम बनाना चाहिए।
  • विद्यालयों का अध्ययनक्रम: विद्यालयों के अध्ययनक्रम को मूल्यांकन और संशोधन के माध्यम से नवीनतम और उपयुक्त बनाया जाना चाहिए।
  • पाठ्यक्रम का नवीनीकरण: नवीनतम ज्ञान और तकनीकों के अनुसार पाठ्यक्रम को अपडेट किया जाना चाहिए, ताकि छात्रों को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्राप्त हो।
  • शैक्षिक संस्थाओं का विकास: शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता को प्रोत्साहित करने के लिए शैक्षिक संस्थाओं के विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • शिक्षकों की प्रशिक्षण और समर्थन: उच्च गुणवत्ता के शिक्षकों की उपलब्धता और प्रशिक्षण को सुनिश्चित करने के लिए नई शिक्षक प्रशिक्षण योजनाओं का आयोजन किया जाना चाहिए।

इन सुधारों के माध्यम से, शिक्षण व्यवस्था को गुणवत्तापूर्ण, प्रभावी और समर्थ बनाने में सहायक हो सकता है, जो शिक्षा क्षेत्र में अग्रसरता और समृद्धि को बढ़ा सकता है।

विशेष बिंदु:-

  • नई शिक्षा नीति के अंतर्गत  भारतीय ज्ञान प्रणालियाँ, जिनमें जनजातीय एवं स्वदेशी ज्ञान शामिल होंगे, को पाठ्यक्रम में सटीक एवं वैज्ञानिक तरीके से शामिल किया जाएगा।
  • आकांक्षी जिले (Aspirational districts) जैसे क्षेत्र जहाँ बड़ी संख्या में आर्थिक, सामाजिक या जातिगत बाधाओं का सामना करने वाले छात्र पाए जाते हैं, उन्हें ‘विशेष शैक्षिक क्षेत्र’ (Special Educational Zones) के रूप में नामित किया जाएगा।
  • देश में क्षमता निर्माण हेतु केंद्र सभी लड़कियों और ट्रांसजेंडर छात्रों को समान गुणवत्ता प्रदान करने की दिशा में एक ‘जेंडर इंक्लूजन फंड’ (Gender Inclusion Fund) की स्थापना करेगा।
  • गौरतलब है कि 8 वर्ष की आयु के बच्चों के लिये प्रारंभिक बचपन देखभाल और शिक्षा हेतु एक राष्ट्रीय पाठ‍्यचर्या और शैक्षणिक ढाँचे का निर्माण एनसीआरटीई द्वारा किया जाएगा।

वित्तीय सहायता

  • एससी, एसटी, ओबीसी और अन्य सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों से संबंधित मेधावी छात्रों को प्रोत्साहन के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।

नई शिक्षा नीति, 2020 के तहत 3 साल से 18 साल तक के बच्चों को शिक्षा का अधिकार कानून, 2009 के अंतर्गत रखा गया है। 34 वर्षों पश्चात् आई इस नई शिक्षा नीति का उद्देश्य सभी छात्रों को उच्च शिक्षा प्रदान करना है जिसका लक्ष्य 2025 तक पूर्व-प्राथमिक शिक्षा (3-6 वर्ष की आयु सीमा) को सार्वभौमिक बनाना है।

स्नातक शिक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, थ्री-डी मशीन, डेटा-विश्लेषण, जैवप्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों के समावेशन से अत्याधुनिक क्षेत्रों में भी कुशल पेशेवर तैयार होंगे और युवाओं की रोजगार क्षमता में वृद्धि होगी।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 21वीं सदी के भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिये भारतीय शिक्षा प्रणाली में बदलाव हेतु जिस नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को मंज़ूरी दी है अगर उसका क्रियान्वयन सफल तरीके से होता है तो यह नई प्रणाली भारत को विश्व के अग्रणी देशों के समकक्ष ले आएगी।

आशा करता हूं आप सभी को मेरे सभी ब्लॉग पसंद आ रहे होंगे आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया।

 

 

Abhay Soni

I am Abhay Soni who has made his mark as a blogger, author, writer. He is found of exploring new places and cultures, which is why he got the chance to write this blogs & books. Thank You:)

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